राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान चिरबटिया: विकास के दावों के बीच बदहाल व्यवस्था

-गौरव रावत

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में तकनीकी शिक्षा को युवाओं के रोजगार और स्वरोजगार का सबसे मजबूत माध्यम माना जाता है। इसी उद्देश्य को लेकर रुद्रप्रयाग और टिहरी जनपद की सीमा पर स्थित चिरबटिया में राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) की स्थापना की गई थी। उम्मीद थी कि यह संस्थान क्षेत्र के युवाओं को तकनीकी रूप से दक्ष बनाकर उनके भविष्य को नई दिशा देगा। लेकिन आज, वर्षों बाद यही संस्थान सरकारी उपेक्षा का शिकार होकर अपनी बदहाली की कहानी स्वयं बयां कर रहा है।

वर्ष 1992 में स्थानीय जनता की लंबे समय से चली आ रही मांग के बाद चिरबटिया में राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य था कि दूर-दराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को घर के नज़दीक तकनीकी शिक्षा उपलब्ध हो और उन्हें रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकें। लेकिन समय के साथ यह संस्थान धीरे-धीरे अपनी पहचान खोता चला गया।

वर्ष 2019 में भवन संबंधी कारणों से संस्थान का संचालन बंद कर दिया गया। इससे क्षेत्र के छात्र-छात्राओं और ग्रामीणों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थानीय जनता ने लगातार विरोध प्रदर्शन और आंदोलन किए, जिसके बाद लगभग दो वर्ष बाद संस्थान का संचालन दोबारा शुरू हो सका। हालांकि दरवाजे फिर से खुल गए, लेकिन व्यवस्थाएं आज भी पूरी तरह पटरी पर नहीं लौट सकीं।

वर्तमान में संस्थान में इलेक्ट्रिशियन, इलेक्ट्रॉनिक्स, वायरमैन, रेडियो तथा शॉर्टहैंड (हिंदी) जैसे ट्रेड संचालित हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन ट्रेडों में पढ़ने वाले छात्र आखिर जाएं तो जाएं कैसे? आज संस्थान में महज लगभग 25 छात्र ही अध्ययन कर रहे हैं। कभी स्थानीय युवाओं की उम्मीद बना यह संस्थान आज लगभग खामोश दिखाई देता है।

स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। पूरे संस्थान की जिम्मेदारी केवल एक शिक्षक के कंधों पर है। एक चौकीदार भी तैनात है, जो आवश्यकता पड़ने पर बच्चों की कक्षाएं तक लेने को मजबूर हो जाता है। यह तस्वीर किसी निजी संस्थान की नहीं, बल्कि सरकार के अधीन संचालित एक तकनीकी शिक्षण संस्थान की है।

तकनीकी शिक्षा का आधार केवल किताबें नहीं, बल्कि आधुनिक मशीनें और व्यावहारिक प्रशिक्षण होता है। लेकिन चिरबटिया संस्थान में आधुनिक उपकरणों का अभाव साफ दिखाई देता है। कई ट्रेडों में विद्यार्थियों को पर्याप्त प्रैक्टिकल सुविधा तक उपलब्ध नहीं है। बिना उपकरणों के तकनीकी शिक्षा केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।

जानकारी के अनुसार संस्थान में उपयोग की जा रही कुछ कुर्सियां भी स्थानीय जनप्रतिनिधि के सहयोग से उपलब्ध कराई गई हैं। यदि एक सरकारी तकनीकी संस्थान अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी दूसरों पर निर्भर हो, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सबसे दुखद बात यह है कि इसी संस्थान से पढ़कर निकले कई छात्र आज देश की प्रतिष्ठित कंपनियों में कार्यरत हैं और अच्छा वेतन प्राप्त कर रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कमी संस्थान की क्षमता में नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था, संसाधनों और योजनाबद्ध विकास में है।

आज चिरबटिया का राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान केवल एक जर्जर इमारत नहीं, बल्कि उन अधूरे वादों का प्रतीक बन चुका है जो पहाड़ के युवाओं से किए गए थे। यदि सरकार वास्तव में पलायन रोकने, कौशल विकास को बढ़ावा देने और स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की बात करती है, तो सबसे पहले ऐसे संस्थानों की स्थिति सुधारनी होगी।

चिरबटिया आईटीआई को केवल रंग-रोगन की नहीं, बल्कि पर्याप्त शिक्षकों, आधुनिक उपकरणों, बेहतर आधारभूत सुविधाओं और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है। अन्यथा यह संस्थान भी धीरे-धीरे केवल सरकारी अभिलेखों तक सीमित होकर रह जाएगा।

आज सवाल सिर्फ एक संस्थान का नहीं, बल्कि उन सैकड़ों युवाओं के भविष्य का है, जिनके सपनों की नींव इसी संस्थान से जुड़ी है।

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