हिमालय में बढ़ती भीड़ : नई त्रासदी को दे रही निमंत्रण

-कुलदीप राणा आजाद
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में लगातार इंसानी भीड़ सचमुच निकट भविष्य में एक बड़ी त्रासदी को निमंत्रण दे रही है। हिमालय की संवेदनशीलता को देखते हुए जिन्ह हिमालयी तीर्थों में ज्यादा जोर से बोलने, जोर से चलने, और पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोल, दमाऊ, शंख बजाने तक की मनाई थी वहाँ आज न केवल लाखों की संख्या में इंसानों का शोरगुल, हुड़दंग हो रहा है बल्कि हिमालयी यहां का पर पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंच रहा है। जहाँ शीतकाल के छः माह इंसानों का प्रवेश तक पूरी तरह वर्जित था वहां आज वर्षभर आधुनिक मशीनों का उपयोग कर हिमालय के साथ लगातार छेड़छाड़ की जा रही है। उत्तराखंड के चारों धाम गंगोत्री यमुनोत्री केदारनाथ बद्रीनाथ में हर साल तीर्थ यात्रियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हो रहा है। इसके अलावा मद्महेश्वर, तुंगनाथ, कल्पेश्वर, रुद्रनाथ जैसे हिमालय में बसे धामों में भी बड़ी सायं में तीर्थ यात्री और पर्यटक पहुंच रहे हैं। तीर्थ यात्रियों की भीड़ का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता कि केदारनाथ में 40 दिनों में दस लाख से ज्यादा यात्री पहुंच चुके हैं।

वर्ष 2013 में गांधी सरोवर (चोराबाड़ी ताल) से जो प्रलय आया था उसने केदारपुरी समेत उसके निचले इलाके को विध्वंस कर दिया था। प्रत्यक्षदर्शी कहते हैं कि इस आपदा में 25 हजार से ज्यादा लोगों की मौतें हुई। हजारों घोड़े खच्चर की भी मौतें हुई। जबकि मकान, दुकान, होटल भी और कई बाजारों का नामोनिशान मिट गया था। इसे जानकारों ने सदी की सबसे भीषण आपदा माना था। उस समय पर्यावरणविदों ने इस प्रलय की मुख्य वजह हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ती भीड़ को माना था। लेकिन हमारी सरकारों ने उस आपदा से सबक लेने की बजाय हिमालय में सीमेंट के कंक्रीट का शहर बसने का बीड़ा उठा दिया। इन मन्दिरों को पूजा पाठ और आध्यात्म से परे सैर सपाटा और पिकनिक प्वाइंट में बदल दिया। यहां भोग विलाश की वो हर सुख सुविधाएं दे दी जिन्हें इंसान का जीवन आसान तो हो रहा लेकिन प्रकृति का कलेजा छलनी छलनी हो रहा।

आंकड़ों पर गौर करें तो केदारनाथ में वर्ष 2003 से 2012 तक 10 वर्षों में करीब 44 लाख तीर्थ यात्री केदारनाथ पहुंचे। जबकि 2014 से 2025 तक 88 लाख श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचे। यानी दुगनी दर से बढ़ोत्तरी हुई है। इस वर्ष 2026 में पहले 40 दिनों में 10 लाख श्रद्धालु और पर्यटक केदारनाथ पहुंच गए हैं।
बद्रीनाथ धाम में भी 2003 से 2012 तक करीब 80 लाख श्रद्धालु पहुंचे। जबकि 2014 से 2025 तक एक करोड़ 11 लाख श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचे। यानी 2013 आपदा के बाद के 12 वर्षों में बद्रीनाथ धाम में आपदा-पूर्व 10 वर्षों की तुलना में लगभग 31 लाख अधिक श्रद्धालु पहुंचे। दिलचस्प बात यह है कि 2022 से 2025 के केवल 4 वर्षों में ही बद्रीनाथ धाम में लगभग 63.7 लाख श्रद्धालु पहुंचे, जो तीर्थाटन में आई तेज वृद्धि को दर्शाता है। यही स्थिति अन्य धामों की भी है। चारों धामों में पहुंच रहे यात्रियों की संख्या से अनुसार पर्याप्त शौचालय नहीं हैं जिससे बड़ी संख्या में खुले में मल मूत्र किया जा रहा । इंसानी मलमूत्र से निकलने वाली गैस मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जलवायु परिवर्तन को बढ़ा रही हैं इससे हिमालय में तापमान वृद्धि और ग्लेशियरों के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो रही है। चारों धामों के लिए संचालित हैली सेवाओं के शोर ने हिमालय हर रोज ऐसे हिलाकर रखा है जैसे कभी भी वह बिखरकर इक बड़े प्रलय का कारण बन सकता है।

उत्तराखंड के पहाड़ों में आने वाले लाखों वाहनों का धुवें से निकलने वाली गैसें, जंगलों की आग और जीवाश्म ईंधनों का उपयोग हिमालयी ग्लेशियरों पर कहीं अधिक बड़ा प्रभाव डाल रहे हैं। “हिमालय श्रद्धा का केंद्र है, लेकिन यदि लाखों यात्रियों के मलमूत्र और कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं हुआ, तो यही आस्था हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव का कारण बन सकती है।” जिसके परिणाम घातक होंगे। लेकिन इसके लिए हमारा प्रशासन, और सरकारे सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। उससे भी जय जिम्मेदार वो संस्थान हैं जिन्हें पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी दी गई है। हमारे देश में NGT जैसे संस्थान भी हिमालय की इस दुर्गति पर मौन बैठी हैं। जबकि पर्यावरण के नाम पर पुरुस्कार लेने वाले तथाकथित पर्यावणविद भी सरकारों की गोद में बैठकर नए पुरस्कार की जिलुगत में हैं।
