इस बार भी अस्पताल की लापरवाही पर पर्दा डाल दिया जांच कमेटी ने, सारा दोषी नाबालिक गर्भवती की मां पर मढ़ दिया
इस बार भी अस्पताल की लापरवाही पर पर्दा डाल दिया जांच कमेटी ने, सारा दोषी नाबालिक गर्भवती की मां पर मढ़ दिया
रूद्रप्रयाग। हमेशा की तरह इस बार भी रूद्रप्रयाग जिला अस्पताल प्रबन्धन ने अपनी जांच रिपोर्ट में गर्भवती नाबालिग की मौत के लिए पूरी तरह उसकी मां ठहरा दिया। रिपोर्ट के अनुसार, बेटी की धीरे धीरे मौत के मुँह में जा रही थी लेकिन मां, बेटी को दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए तैयार नहीं हुई। डॉक्टर बार-बार मां को बेटी की बिगड़ती हालत के बारे में आगाह करते रहे मगर वह जिला अस्पताल में ही इलाज कराने पर अड़ी रही। लेकिन इस रिपोर्ट में कहीं भी अस्पताल की लापरवाही का कोई जिक्र नहीं है। यानी हमेशा कि तरह इस बार भी अस्पताल को क्लिन चिट दे दी गई। वाह! रे जिला अस्पताल के जांचकर्ता।
विदित हो कि रूद्रप्रयाग में 23 जुलाई को को एक नाबालिक गर्भवती के जच्चा-बच्चा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो जाने के बाद जिला अस्पताल रूद्रप्रयाग की सबसे बड़ी लापरवाही सामने आई थी जिस पर अस्पताल की तीन सदस्यीय कमेटी ने मामले की जांच की है। रिपोर्ट के अनुसार, लड़की की मां ने अस्पताल में पुरुष डॉक्टर तो दूर महिला डॉक्टर को भी बेटी को छूने नहीं दिया। यहां तक कि पेशाब की जांच भी नहीं कराने दी। जब चिकित्सकों ने हिमोग्लोबिन कम होने और खून अस्पताल में नहीं होने पर सीधे हायर सेंटर रेफर करने के लिए कहा तो वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी। अस्पताल प्रबंधन ने रेफर के कागजात तैयार कर दो बार एंबुलेंस भी बुलाई लेकिन महिला बेटी को ले जाने के लिए तैयार नहीं हुई। परिजन श्रीनगर से दो यूनिट खून भी लेकर आ गए। उनका कहना था कि बेटी का इलाज रुद्रप्रयाग में ही किया जाए।
शाम को जिला चिकित्सालय प्रबंधन ने नाबालिग को मजबूरन जनरल वार्ड में भर्ती किया लेकिन मां ने चिकित्सकों का कोई सहयोग नहीं किया। जांच कमेटी में शामिल एक चिकित्सक ने बताया कि मां ने अपनी ही बेटी के उपचार में कोई सहयोग नहीं किया। पूरे प्रकरण में कई बातें संदिग्ध नजर आई हैं। दूसरी तरफ पुलिस सीसीटीवी फुटेज में घटना के समय अस्पताल में नजर आए संदिग्धों की तलाश में जुटी है। जिला चिकित्सालय रुद्रप्रयाग में 23 जुलाई की रात नाबालिग व उसके नवजात शिशु की मौत के मामले में मुख्य चिकित्साधिकारी ने भी अलग से जांच कराई है। इसमें सामने आया है कि नाबालिग की प्लेटलेट्स 10 हजार से कम हो गई थी, जिस कारण उसे अधिक रक्तस्राव होने लगा था। इस परिस्थिति में जिला चिकित्सालय प्रबंधन को पुलिस अभिरक्षा में नाबालिग को हायर सेंटर रेफर करना चाहिए था। लेकिन परिजनों के लिखित पत्र के आगे गैरजिम्मेदाराना तरीके से अस्पताल प्रबंधन मजबूर हो गया। नाबालिग लड़की इंटरमिडिएट की छात्रा थी। बताया जा रहा है कि जुलाई माह में वह सिर्फ दो दिन ही स्कूल गई थी। अक्सर उसके अनुपस्थित रहने पर स्कूल प्रबंधन ने जानकारी जुटाई। परिजनों ने उसकी तबीयत खराब होने की बात कही थी।

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